राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर।

क्षमा और शक्ति =रामधारी सिंह दिनकर। 

रामधारी सिंह दिनकर।  
रामधारी दिनकर जी का जन्म 24 सितंबर उन्नीस सौ आठ को बेगूसराय के जिले में सिमरिया नामक गांव में हुआ था और उनकी मृत्यु तिथि 24 अप्रैल 1947 उम्र (65) में मद्रास तमिल नाडु भारत में हुआ था उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास राजनीतिक विज्ञान में बीए किए। उन्होंने संस्कृत बांग्ला उर्दू अंग्रेजी का अध्ययन किया बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एक विद्यालय में अध्यापक बने और बाद में वह भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर कार्य किए फिर उनके बाद भारत सरकार के हिंदी सलाहकार बने उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी अलंकृत किया गया उनकी पुस्तक संस्कृत के चार अध्याय के लिए साहित्य अकादमी के लिए पुरस्कार तथा उर्वशी के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा सदा के लिए अमर रहेंगे। 
       उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं। 
    कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, हुंकार, संस्कृत के चार अध्याय, परशुराम की प्रतीक्षा, हाहाकार इत्यादि। 

        मनोउपरांत सम्मान 30 सितंबर 1987 को उनकी पहली पुण्यतिथि पर मिला। 
      
  शक्ति और क्षमा =)रामधारी सिंह दिनकर। (कविता)
         

 शक्ति और क्षमा -रामधारी सिंह दिनकर।

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
 सबका लिया सहारा
 पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
 कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
 तुम हुये विनत जितना ही
 दुष्ट कौरवों ने तुमको
 कायर समझा उतना ही।

 अत्याचार सहन करने का
 कुफल यही होता है
 पौरुष का आतंक मनुज
 कोमल होकर खोता है।

 क्षमा शोभती उस भुजंग को
 जिसके पास गरल हो
 उसको क्या जो दंतहीन
 विषरहित, विनीत, सरल हो।

 तीन दिवस तक पंथ मांगते
 रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
 अनुनय के प्यारे-प्यारे।

 उत्तर में जब एक नाद भी
 उठा नहीं सागर से
 उठी अधीर धधक पौरुष की
 आग राम के शर से।

 सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
 करता आ गिरा शरण में
 चरण पूज दासता ग्रहण की
 बँधा मूढ़ बन्धन में।

 सच पूछो, तो शर में ही
 बसती है दीप्ति विनय की
 सन्धि-वचन सम्पूज्य उसी का
 जिसमें शक्ति विजय की।

 सहनशीलता, क्षमा, दया को
 तभी पूजता जग है
 बल का दर्प चमकता उसके
 पीछे जब जगमग है।     
  
                       क्षमा और शक्ति
    ~कवि रामधारी सिंह दिनकर~✍️...)

                 सपना झा:)

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